Sunday, October 2, 2011

प्रेम-लीला

तुझे फिर फिर पाके फिर फिर खोने में मज़ा है।
तुझे फिर फिर पाके फिर फिर खोने में मज़ा है।
क्योंकि जब पा ही लिया, तो खोना क्या है?

तू मेरी, मैं तेरा इसमें नया क्या है?
नया तो तब होगा, जब तुझे खो कर पाऊँ , पाकर खोऊँ, तू मेरी मैं तेरा ये भुला कर खोऊँ।
फिर तुझे पाऊँ , याद करू और याद दिलाऊँ ।
कभी तू ढूंढे मुझे, कभी मैं तेरे पीछे पीछे आऊँ।

प्रेम महज़ हमारा संगम नहीं है।
प्रेम तो सफर है, तलाश है।
चलो अब संगम हुआ पूरा,
फिर भूल जाये एक दूसरे को प्रिए।
और फिर मिले अजनबी की तरह । प्यार की छुपी छुपी दबी दबी तलाश में।
फिर ढूँढू मैं खुदको तुझमे,
तू ढूँढे अपने को मुझमे।
फिर खोये हम बचकाने ख़्वाबों में।
फिर वही शान्ति की खोज में जाऊँ।
हार के अपना सब कुछ तुझमे,
फिर बैठ किनारे प्रेम-पीड़ा के गीत बनाऊ।
नदियों को सुनाऊँ।
तुझे फिर फिर खोऊँ, फिर फिर पाऊँ।

- दुर्गेश



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